आगरा में प्रदूषण के आंकड़ों पर सवाल: स्मार्ट सिटी और प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट में बड़ा अंतर, आखिर सांसों का सच क्या?
आगरा में स्मार्ट सिटी के सेंसर और यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के AQI आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। अर्जुन नगर, राजामंडी समेत कई इलाकों में पीएम-10 का स्तर अधिक दर्ज होने से शहर की हवा की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
आगरा। ताजनगरी आगरा में वायु प्रदूषण को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। शहर में हवा की गुणवत्ता मापने वाले आगरा स्मार्ट सिटी के नए पर्यावरण सेंसर और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के स्टेशनों के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। स्मार्ट सिटी के सेंसर कई चौराहों पर हवा को खराब से लेकर खतरनाक स्तर तक बता रहे हैं, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के छह स्टेशनों पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) मध्यम स्तर पर दर्ज किया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर शहर की हवा की वास्तविक स्थिति क्या है।
आगरा में 20 लाख से अधिक लोगों की सेहत पर प्रदूषण का खतरा मंडरा रहा है। तापमान में गिरावट, सड़कों की खुदाई, निर्माण कार्य और उड़ती धूल ने परेशानी बढ़ा दी है। शहर के कई इलाकों में धूल के गुबार दिखाई दे रहे हैं, लेकिन प्रदूषण मापने वाले दोनों सिस्टम अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।
39 चौराहों पर लगे नए सेंसर, 32 जगह हवा खराब
आगरा स्मार्ट सिटी की ओर से शहर के 39 चौराहों पर नए पर्यावरण सेंसर लगाए गए हैं। इनमें से 38 सेंसर का डाटा सोमवार से उपलब्ध होना शुरू हुआ। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, दो चौराहों पर हवा खतरनाक, तीन पर बेहद खराब और 27 चौराहों पर खराब श्रेणी में दर्ज की गई।
इसके विपरीत, यूपीपीसीबी के शहर में स्थापित छह निगरानी स्टेशनों पर वायु गुणवत्ता मध्यम स्तर की बताई गई। खास बात यह है कि जिन स्थानों पर स्मार्ट सिटी के सेंसर ने प्रदूषण का स्तर अधिक दिखाया, वहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े अपेक्षाकृत बेहतर रहे।
खुदाई वाले इलाकों में धूलकणों का स्तर ज्यादा
मुख्यमंत्री ग्रिड (सीएम ग्रिड) योजना के तहत आगरा में पांच स्थानों पर करीब 12 किलोमीटर लंबी सड़कों पर निर्माण और खुदाई का काम चल रहा है। इन कार्यस्थलों के आसपास लगे स्मार्ट सिटी सेंसरों ने वायु प्रदूषण और पीएम-10 कणों का अधिक स्तर दर्ज किया।
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अर्जुन नगर तिराहा: यहां पीएम-10 कणों की मात्रा 863 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक दर्ज की गई, जो दिए गए आंकड़ों में सबसे अधिक थी। जाम और उड़ती धूल ने लोगों की परेशानी बढ़ाई।
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राजामंडी: सीएम ग्रिड योजना के तहत चल रही सड़क की खुदाई के बीच पीएम-10 का स्तर 698 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया।
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राजेश्वर मंदिर के पास, इंदिरापुरम: निर्माण कार्य के दौरान धूलकणों की मात्रा 456 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पाई गई।
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बारहखंभा: रेलवे पुल के निर्माण और उड़ती धूल का असर भी वायु गुणवत्ता के आंकड़ों में दिखाई दिया।
इन आंकड़ों के बीच स्थानीय लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वे जिन इलाकों में रह रहे हैं, वहां प्रदूषण का वास्तविक स्तर कितना है।
तीन महीने तक बंद रहे स्मार्ट सिटी के सेंसर
जानकारी के मुताबिक, स्मार्ट सिटी के पर्यावरण सेंसर पिछले तीन महीने से खराब होने के कारण बंद थे। नए सेंसर लगाए जाने के बाद जब इनसे आंकड़े मिलने शुरू हुए, तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्टेशनों की तुलना में दो से तीन गुना तक अधिक प्रदूषण दर्ज किया गया।
हालांकि, दोनों प्रणालियों के आंकड़ों में अंतर होने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि कोई एक रिपोर्ट गलत है। सेंसर की लोकेशन, उन्हें स्थापित करने की ऊंचाई, मापने की तकनीक और आसपास की परिस्थितियां भी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए दोनों प्रणालियों के आंकड़ों की तकनीकी जांच जरूरी है।
नगर निगम ने नए सेंसरों के आंकड़ों को बताया सही
नगर निगम के पर्यावरण अभियंता पंकज भूषण के अनुसार, स्मार्ट सिटी में नए सेंसर लगाए गए हैं और उनका डाटा सही है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्टेशनों और स्मार्ट सिटी के सेंसरों के बीच आंकड़ों में अंतर हो सकता है। दोनों की लोकेशन और स्थापित करने की ऊंचाई अलग होने से भी परिणामों में फर्क आ सकता है।
टीटीजेड अथॉरिटी की बैठक में उठेगा मुद्दा
ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) अथॉरिटी के सदस्य इंजीनियर उमेश शर्मा ने कहा कि लगातार खुदाई के कारण लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। उनके मुताबिक, सीएम ग्रिड के कार्यों में निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रदूषण के आंकड़ों में अंतर को भरोसे का संकट बताते हुए कहा कि इस मुद्दे को टीटीजेड की बैठक में उठाया जाएगा।
यूपीपीसीबी ने बताई तकनीकी वजह
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी रामगोपाल ने बताया कि बोर्ड की मशीनों और स्मार्ट सिटी के सेंसरों की तकनीक तथा प्रदूषण मापने की क्षमता में अंतर हो सकता है। उनके अनुसार, बोर्ड के आंकड़े ऑटोमेटिक मॉनिटरिंग मशीनों से लिए जाते हैं, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मानकों के अनुरूप हैं।
आखिर आगरा की हवा कितनी प्रदूषित है?
आगरा में प्रदूषण के इन अलग-अलग आंकड़ों ने हवा की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ निर्माण कार्यों और धूल के कारण कई चौराहों पर प्रदूषण का स्तर अधिक दर्ज किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी निगरानी स्टेशनों के आंकड़े अपेक्षाकृत बेहतर तस्वीर दिखा रहे हैं।
ऐसे में जरूरी है कि दोनों प्रणालियों के आंकड़ों का मिलान किया जाए, सेंसरों की जांच हो और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। क्योंकि प्रदूषण के आंकड़ों में अंतर केवल तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह शहर के लोगों की सेहत और प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसे से भी जुड़ा है।