इशारे बन गए शब्द: न्याय की ये कहानी है उस मासूम की, जो बोल नहीं सकती; अदालत ने सुनाई दरिंदे को ये सजा
आगरा के ताजगंज क्षेत्र में 18 वर्षीय मूक और मानसिक रूप से कमजोर युवती से दुष्कर्म के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। पीड़िता के इशारों और उसकी छोटी बहन के लिखित बयान को अहम साक्ष्य माना गया।
आगरा। आगरा के ताजगंज क्षेत्र में 18 वर्षीय मूक और मानसिक रूप से कमजोर युवती से दुष्कर्म के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। मामले में पीड़िता के इशारों और उसकी छोटी बहन द्वारा लिखित रूप में दिए गए बयान को अहम साक्ष्य माना गया।
अदालत ने गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया। यह मामला मई 2024 का है, जब पीड़िता के पिता ने ताजगंज थाने में पड़ोस में दुकान करने वाले गोविंदा उर्फ हरगोविंद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
मई 2024 में सामने आया था मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता के पिता ने शिकायत में बताया था कि 20 मई 2024 को दोपहर के समय वह घर के बाहर सो रहे थे। उनकी पत्नी मायके गई थीं और परिवार के अन्य सदस्य काम से बाहर थे। घर में उनकी 18 वर्षीय बेटी मौजूद थी, जो बोलने में अक्षम और मानसिक रूप से कमजोर है।
आरोप था कि इसी दौरान पड़ोस में दुकान करने वाला गोविंदा उर्फ हरगोविंद घर में आया और युवती के साथ दुष्कर्म किया। पिता के जागने और अंदर जाने पर आरोपी मौके से भाग गया। इसके बाद युवती रोते हुए उनके पास पहुंची। उसकी छोटी बहन ने इशारों के माध्यम से घटना की जानकारी समझी और परिवार को बताया।
पीड़िता के इशारों और बहन के लिखित बयान को माना अहम
मामले की विवेचना पूरी करने के बाद पुलिस ने 12 जून 2024 को अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता और उसकी छोटी बहन समेत पांच गवाह पेश किए गए। वहीं, बचाव पक्ष ने भी चार गवाहों के बयान कराए।
पीड़िता बोलकर अपनी बात नहीं रख सकती थी, इसलिए उसने इशारों के माध्यम से अपनी बात बताई। उसकी छोटी बहन ने उन इशारों के आधार पर बयान लिखकर प्रस्तुत किया। अदालत ने गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद आरोपी को दोषी ठहराया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश नीरज श्रीवास्तव ने दोषी को 10 साल के कठोर कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
बचाव पक्ष ने उठाए थे विवेचना और गवाही पर सवाल
सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने विवेचना की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष का तर्क था कि जांच अधिकारी ने घटनास्थल के आसपास रहने वाले लोगों को गवाह नहीं बनाया। साथ ही, चिकित्सकीय साक्ष्य में दुष्कर्म की पुष्टि को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं मिलने और प्राथमिकी दो दिन बाद दर्ज होने का मुद्दा भी उठाया गया।
बचाव पक्ष ने स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किए जाने का तर्क भी रखा। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों पर विचार करने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया।
अदालत ने प्राथमिकी में देरी और स्वतंत्र गवाह पर कही यह बात
अदालत ने टिप्पणी की कि विवेचना में कमी होने मात्र से आरोपी को उसका लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत के अनुसार, इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई दो दिन की देरी को असामान्य नहीं माना जा सकता।
स्वतंत्र गवाहों के संबंध में अदालत ने पीड़िता के परिवार की परिस्थितियों और आरोप की गंभीरता पर भी विचार किया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाते हुए दोषी को कठोर कारावास और जुर्माने की सजा दी।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि किसी पीड़ित के बोलने में असमर्थ होने पर भी उसके इशारों, गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों का न्यायिक परीक्षण किया जा सकता है।