स्मार्ट सिटी आगरा की शर्मनाक तस्वीर: सड़कों पर नाले की दुर्गंध, खुले गड्ढे और हर कदम पर खतरा
आगरा के काजीपाड़ा, मंटोला और लोहामंडी के खुले नाले लोगों के लिए मुसीबत बने हैं। दुर्गंध, गंदगी, जलभराव और टूटे किनारों से हादसे का खतरा बढ़ गया है। पार्षदों ने नालों को प्रीकास्ट स्लैब से ढकने की मांग उठाई है।
आगरा। ताजमहल की खूबसूरती और ऐतिहासिक विरासत के लिए दुनिया में मशहूर आगरा के बीचों-बीच बह रहे खुले नाले अब लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन चुके हैं। काजीपाड़ा, मंटोला और लोहामंडी क्षेत्र में नालों से उठती तेज दुर्गंध, गंदगी और टूटे किनारों ने आसपास रहने वाले लोगों का जीवन मुश्किल कर दिया है। बारिश के दौरान हालात और गंभीर हो जाते हैं। कई जगह नाले का पानी घरों तक पहुंच जाता है, वहीं खुले हिस्सों में बच्चों और राहगीरों के गिरने का खतरा बना रहता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से इन नालों की समस्या बनी हुई है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हो सका है। नालों के आसपास बड़ी आबादी रहती है और कई जगह घर सीधे नालों के किनारे बने हुए हैं। ऐसे में बदबू, गंदगी और जलभराव लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं।
काजीपाड़ा का नाला: बारिश में घरों तक पहुंचता है पानी
काजीपाड़ा का नाला करीब डेढ़ किलोमीटर लंबा बताया गया है। इसके दोनों ओर बड़ी संख्या में घर बने हुए हैं। इलाके में जूते की दस्तकारी का काम भी होता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के दौरान नाले का पानी ओवरफ्लो होकर करीब दो फीट तक घरों में पहुंच जाता है।
खुले नाले के कारण बच्चों और राहगीरों के लिए भी खतरा बना रहता है। स्थानीय पार्षद का कहना है कि नाले में गिरने से पहले भी कई हादसे हो चुके हैं। बारिश के दौरान सड़क और नाले के बीच का अंतर भी साफ दिखाई नहीं देता, जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
लोहामंडी का नाला: टूटी दीवारों से बढ़ा खतरा
लोहामंडी का नाला करीब तीन किलोमीटर लंबा है। इसके आसपास भी बड़ी संख्या में मकान बने हुए हैं। कई स्थानों पर नाले की दीवारें टूट चुकी हैं, जिससे नाले में गिरने का खतरा बना हुआ है।
सबसे ज्यादा चिंता बच्चों को लेकर है। खुले और गहरे नाले के किनारे सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने से किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है। बारिश के दिनों में पानी बढ़ने पर यह खतरा और बढ़ जाता है।
मंटोला नाला: चमड़े की कतरन और केमिकल से दुर्गंध
मंटोला का नाला भी करीब तीन किलोमीटर लंबा है। इसके आसपास जूते के कारखाने और अन्य छोटे उद्योगों से जुड़ा काम होता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नाले में चमड़े की कतरन और अन्य अपशिष्ट डाले जाने से गंदगी और दुर्गंध की समस्या बढ़ जाती है।
कतरन और दूसरे अपशिष्ट के कारण नाले का पानी प्रदूषित होने के साथ आसपास के वातावरण में तेज बदबू फैलती है। लोगों का कहना है कि लंबे समय तक इस माहौल में रहना बेहद मुश्किल हो गया है।
पार्षदों ने उठाई नालों को ढकने की मांग
खुले नालों की समस्या को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी आवाज उठाई है। पार्षदों का कहना है कि नगर निगम सदन में प्रस्ताव लाकर इन खुले नालों को प्रीकास्ट स्लैब या सीसी से कवर कराने की मांग की जाएगी।
पार्षद मो. शहजाद ने बताया कि मंटोला नाला कई जगह करीब 20 फीट तक गहरा है और दोनों किनारों पर आबादी बसी हुई है। उन्होंने कहा कि जहां नाले की दीवारें टूटी हैं, वहां पहले मरम्मत कराई जाए और इसके बाद नाले को प्रीकास्ट स्लैब या सीसी से ढका जाए।
काजीपाड़ा की पार्षद मीना देवी के मुताबिक नाले में गिरने से पहले भी कई लोगों की जान जा चुकी है। बारिश के दौरान सड़क और नाले का अंतर खत्म हो जाता है, जिससे हादसे की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने नाले को ढकने के लिए नगर निगम में प्रस्ताव लाने की बात कही।
पार्षद शरद चौहान ने कहा कि पहले नालों की तलीझाड़ सफाई कराई जाए और इसके बाद प्रीकास्ट स्लैब से इन्हें ढक दिया जाए। इससे नाले में कूड़ा-कचरा और चमड़े की कतरन डालने पर भी रोक लगाई जा सकेगी और दुर्गंध की समस्या कम होगी।
सवाल सिर्फ बदबू का नहीं, सुरक्षा का भी है
काजीपाड़ा, मंटोला और लोहामंडी के खुले नाले सिर्फ गंदगी और दुर्गंध की समस्या नहीं हैं। इनके आसपास रहने वाली आबादी के लिए सुरक्षा, जलभराव और स्वच्छता भी बड़े सवाल हैं। खासकर बारिश के दौरान खुले नाले और सड़क के बीच अंतर दिखाई न देने से बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों के लिए खतरा बढ़ जाता है।
अब स्थानीय लोगों की नजर नगर निगम की कार्रवाई पर है। सवाल यही है कि इन नालों को कब तक खुला छोड़कर लोगों को दुर्गंध और हादसे के खतरे के बीच रहने के लिए मजबूर किया जाएगा?
स्मार्ट सिटी आगरा की पहचान तभी मजबूत होगी, जब शहर के खुले नाले भी सुरक्षित, साफ और व्यवस्थित नजर आएंगे।