आगरा का 450 साल पुराना कालीन उद्योग संकट में: युद्ध, महंगे कच्चे माल और घटते ऑर्डर से टूट रही कारीगरों की उम्मीदें
450 साल पुराने आगरा के हस्तनिर्मित कालीन उद्योग पर युद्ध, महंगे कच्चे माल और बढ़ती शिपिंग लागत का गहरा असर पड़ा है। छह वर्षों में कारीगरों की संख्या 45 हजार से घटकर 25 हजार रह गई है, जबकि नए ऑर्डर नहीं मिलने से हजारों परिवारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
आगरा: मुगलकाल से चली आ रही आगरा की हस्तनिर्मित कालीन कला आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी दुनिया भर में अपनी बारीक बुनाई और शानदार डिजाइन के लिए मशहूर रहा 450 साल पुराना आगरा का कालीन उद्योग अब युद्ध, बढ़ती उत्पादन लागत और निर्यात में गिरावट की मार झेल रहा है। हालात ऐसे हैं कि जहां कभी हजारों करघों पर दिन-रात कालीन बुने जाते थे, वहीं आज कई इकाइयों में धागे तो पड़े हैं, लेकिन ऑर्डर नहीं हैं।
450 साल पुरानी विरासत पर संकट के बादल
मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में आगरा में कालीन बुनाई की शुरुआत हुई थी। फारसी शैली से प्रेरित इस कला को स्थानीय कारीगरों ने नई पहचान दी और धीरे-धीरे आगरा दुनिया के प्रमुख हस्तनिर्मित कालीन केंद्रों में शामिल हो गया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह हुनर आगे बढ़ता रहा, लेकिन अब बदलते बाजार और आर्थिक चुनौतियों ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया है।
युद्ध और महंगाई ने बढ़ाई मुश्किलें
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि पहले रूस-यूक्रेन युद्ध, फिर अमेरिकी टैरिफ और अब ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लागत भी पहले की तुलना में तीन से चार गुना तक बढ़ गई है। नतीजतन, अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख बाजारों से नए ऑर्डर कम हो गए हैं।
45 हजार से घटकर रह गए 25 हजार कारीगर
कभी इस उद्योग से जुड़े कारीगरों की संख्या 80 हजार के आसपास थी। कोविड-19 के बाद यह घटकर 45 हजार रह गई और अब महज 25 हजार कारीगर ही इस पारंपरिक कला से जुड़े हैं। पिछले छह वर्षों में हजारों कारीगर रोजगार छोड़कर दूसरे कामों की ओर चले गए हैं। कई छोटे कारखाने भी बंद हो चुके हैं, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है।
1,000 करोड़ रुपये से अधिक का उद्योग
आगरा का हस्तनिर्मित कालीन उद्योग 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करता है। जिले में लगभग 6,000 कुटीर इकाइयां गांव-गांव में संचालित हैं, जो शहर के निर्यातकों के लिए कालीन तैयार करती हैं। हालांकि मांग घटने के कारण इन इकाइयों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।
ताजमहल का ऐतिहासिक कालीन आज भी विदेश में सुरक्षित
कालीन निर्यातक संजय कालरा के अनुसार, मुगलकाल में ताजमहल के मुख्य मकबरे में बिछा ऐतिहासिक कालीन आज अमेरिका के हवाई में सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने बताया कि विदेशों में आयोजित कार्यशालाओं में आज भी आगरा के हस्तनिर्मित कालीनों की गुणवत्ता और बारीक कारीगरी की मिसाल दी जाती है। अमेरिका और यूरोप में आज भी हाथ से बने आगरा के कालीनों की विशेष मांग है, क्योंकि यहां डिजाइन से लेकर फिनिशिंग तक पूरा काम हाथों से किया जाता है।
नई पीढ़ी नहीं सीख रही पारंपरिक कला
फतेहपुर सीकरी, फतेहाबाद, शमशाबाद, सैयां, बिचपुरी, किरावली, अछनेरा और मिढ़ाकुर जैसे क्षेत्रों में आज भी कालीन बुनाई का काम होता है। लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कम आमदनी और घटती मांग के कारण नई पीढ़ी इस कला को अपनाने में रुचि नहीं दिखा रही है। इससे सदियों पुरानी यह पारंपरिक विरासत धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
सरकार से मदद की उम्मीद
कालीन निर्यातकों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते आर्थिक सहायता, निर्यात प्रोत्साहन और कच्चे माल पर राहत जैसे कदम नहीं उठाए, तो आगरा का यह ऐतिहासिक उद्योग गंभीर संकट में आ सकता है। उनका मानना है कि उचित नीतियों और वैश्विक बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने से यह उद्योग फिर से नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
आगरा का कालीन उद्योग केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और हस्तशिल्प विरासत का एक अनमोल हिस्सा है। इसे बचाना हजारों कारीगरों के भविष्य के साथ-साथ देश की ऐतिहासिक पहचान को भी सुरक्षित रखने जैसा है।