नई किताब ‘टीन इन द कैंटीन’: किशोरों को उनकी ही भाषा में मिलेगी जिंदगी के अनुभवों की सीख
आगरा के लेखक पुनीत वशिष्ठ ने अपनी पहली द्विभाषी पुस्तक ‘टीन इन द कैंटीन’ लॉन्च की। कहानियों के जरिए किशोरों को जीवन-मूल्यों और सही निर्णयों की सीख दी गई है।
आगरा। जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल के प्रधानाचार्य और लेखक पुनीत वशिष्ठ अपनी पहली द्विभाषी पुस्तक ‘टीन इन द कैंटीन’ लेकर पाठकों के बीच आए हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘मृत्युंजय’ को मिली सफलता के बाद यह उनकी दूसरी पुस्तक है। हिंदी और अंग्रेजी में लिखी गई यह पुस्तक विशेष रूप से किशोरों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
लेखक के अनुसार, किशोरावस्था जीवन का ऐसा दौर है, जब बच्चे बदलती दुनिया, दोस्ती, रिश्तों, भावनाओं और भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं। इस उम्र में सीधे उपदेश देने के बजाय यदि कहानियों के माध्यम से उन्हें परिस्थितियों को समझने का मौका दिया जाए, तो सीख अधिक प्रभावी हो सकती है। इसी सोच के साथ ‘टीन इन द कैंटीन’ को आकार दिया गया है।
कहानियों के जरिए जीवन के फैसलों की सीख
पुस्तक में किशोरों की रोजमर्रा की जिंदगी और उनके आसपास के परिवेश से जुड़ी कहानियों को आधार बनाया गया है। इन कहानियों के माध्यम से जीवन-मूल्यों, रिश्तों और निर्णय लेने जैसी महत्वपूर्ण बातों को सहज तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक की खासियत यह है कि इसमें किशोरों को सीधे यह नहीं बताया जाता कि क्या सही है और क्या गलत। इसके बजाय उन्हें कहानी के पात्रों और परिस्थितियों से जोड़ने की कोशिश की गई है।
कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पाठक खुद महसूस कर पाते हैं कि किसी निर्णय का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। यही शैली पुस्तक को किशोर पाठकों के लिए सहज और रोचक बनाती है।
पहली द्विभाषी पुस्तक है ‘टीन इन द कैंटीन’
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका द्विभाषी स्वरूप शामिल है। इसमें सरल और रोजमर्रा की हिंदी तथा अंग्रेजी का लाइन-बाय-लाइन प्रयोग किया गया है।
यह शैली उन विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी हो सकती है, जो हिंदी माध्यम से पढ़ाई करते हैं और साथ ही अंग्रेजी भाषा को बेहतर तरीके से समझना और सीखना चाहते हैं। पुस्तक में भाषा को कठिन और किताबी बनाने के बजाय किशोरों के दैनिक संवाद और उनके परिचित परिवेश के करीब रखने का प्रयास किया गया है।
‘उपदेश से ज्यादा असरदार होती है कहानी’
पुनीत वशिष्ठ का मानना है कि एक प्रभावी कहानी कई बार उस बात को आसानी से समझा सकती है, जिसे लंबा उपदेश भी प्रभावी तरीके से नहीं समझा पाता। इसी विचार को उन्होंने ‘टीन इन द कैंटीन’ की मूल भावना बनाया है।
पुस्तक में किशोरों के सामने आने वाली परिस्थितियों को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वे स्वयं उन परिस्थितियों पर विचार कर सकें और निर्णयों के परिणाम को समझ सकें।
अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी उपयोगी
‘टीन इन द कैंटीन’ सिर्फ किशोरों तक सीमित नहीं है। पुस्तक के माध्यम से अभिभावक और शिक्षक भी किशोरों की सोच, भावनाओं और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
किशोरावस्था में बच्चों के व्यवहार और सोच में तेजी से बदलाव आता है। ऐसे में उनके साथ संवाद स्थापित करना और उनकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है। पुस्तक इसी संवाद को एक सहज माध्यम देने का प्रयास करती है।
पुनीत वशिष्ठ की यह नई पुस्तक किशोरों को जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित कराने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के बीच सहज संवाद स्थापित करने की कोशिश करती है। कहानियों और द्विभाषी प्रस्तुति का यह संयोजन इसे किशोर पाठकों के लिए अलग और उपयोगी बनाता है।