राजकुमार चाहर की राष्ट्रीय टीम से विदाई के बाद आगरा BJP में बदलेंगे सियासी समीकरण? कई खेमों की बढ़ी धड़कन
राजकुमार चाहर को भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिलने के बाद आगरा की सियासत में नए समीकरण बनने की चर्चा तेज है। स्थानीय भाजपा के अलग-अलग खेमों के बीच उनकी सक्रियता का असर 2027 चुनाव से पहले देखने को मिल सकता है।
आगरा। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में अहम भूमिका निभाने वाले फतेहपुर सीकरी सांसद राजकुमार चाहर को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में जगह नहीं मिली है। करीब छह वर्षों तक भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद अब उनके संगठनात्मक दायित्व से बाहर होने को आगरा की स्थानीय राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पद पर रहने के कारण राजकुमार चाहर का प्रभाव सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं था। आगरा में केंद्रीय राज्यमंत्री और प्रदेश सरकार के कई कैबिनेट मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद पार्टी के कार्यक्रमों में उन्हें प्रमुख स्थान मिलता रहा। शासन और प्रशासन से जुड़े मामलों में भी उनकी सक्रियता और प्रभाव चर्चा में रहा है।
अब स्थानीय राजनीति में बढ़ सकती है सक्रियता
राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी नहीं मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजकुमार चाहर अब अपनी राजनीतिक ऊर्जा किस दिशा में लगाएंगे। अभी तक उनका फोकस मुख्य रूप से दिल्ली और राष्ट्रीय संगठन की राजनीति पर रहा है। ऐसे में यदि वह आगरा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो भाजपा के भीतर पहले से मौजूद गुटीय समीकरण प्रभावित होना तय माना जा रहा है।
आगरा भाजपा में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र हैं। एक तरफ केंद्रीय राज्यमंत्री एसपी सिंह बघेल और कैबिनेट मंत्री योगेंद्र उपाध्याय का प्रभाव माना जाता है, जबकि दूसरी ओर राज्यसभा सांसद नवीन जैन, एमएलसी विजय शिवहरे और महानगर अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता से जुड़े नेताओं का अपना मजबूत नेटवर्क है। वहीं कैबिनेट मंत्री बेबी रानी मौर्य की राजनीतिक सक्रियता भी अलग दिखाई देती है।
पुराने मतभेद फिर बन सकते हैं मुद्दा
राजकुमार चाहर की स्थानीय राजनीति में वापसी ऐसे समय हो रही है, जब भाजपा के भीतर कई नेताओं के बीच पुराने राजनीतिक मतभेद भी चर्चा में रहे हैं। विधायक चौधरी बाबूलाल और पक्षालिका सिंह के साथ उनके राजनीतिक संबंधों को लेकर भी लंबे समय से अलग-अलग चर्चाएं होती रही हैं।
जिलाध्यक्ष प्रशांत पौनिया को चाहर के करीबी नेताओं में गिना जाता है। हालांकि, जब चाहर खेमे से जुड़ी मानी जाने वालीं महापौर हेमलता दिवाकर विवादों में घिरीं, तब संगठन के भीतर से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में रही।
किस खेमे को होगा फायदा?
राजकुमार चाहर के राष्ट्रीय संगठन से बाहर होने का असर सबसे ज्यादा आगरा की स्थानीय भाजपा पर पड़ सकता है। अब तक राष्ट्रीय पद के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव एक अलग स्तर पर था। स्थानीय राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ती है तो पुराने समर्थकों को फिर से एकजुट करने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि, इससे दूसरे खेमों के सामने भी नई चुनौती खड़ी होगी। आने वाले समय में संगठनात्मक नियुक्तियों, स्थानीय कार्यक्रमों और चुनावी रणनीति में किस नेता की पकड़ मजबूत होती है, इससे भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन का अंदाजा लगाया जा सकेगा।
2027 से पहले दिलचस्प होगी आगरा की सियासत
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन में बदलावों का दौर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में राजकुमार चाहर की राष्ट्रीय टीम से बाहर होने के बाद उनकी अगली राजनीतिक भूमिका पर नजरें टिक गई हैं।
अब तक दिल्ली की राजनीति में मजबूत प्रभाव रखने वाले चाहर यदि आगरा में सक्रिय भूमिका अपनाते हैं, तो पार्टी के भीतर पुराने समीकरणों में बदलाव संभव है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि राजकुमार चाहर का अगला कदम क्या होगा, बल्कि यह भी है कि उनकी सक्रियता के बाद आगरा भाजपा में कौन सा खेमा मजबूत होगा और कौन सा कमजोर।
फिलहाल, भाजपा के भीतर हर खेमे की नजर चाहर की अगली चाल पर है। आने वाले दिनों में उनकी सक्रियता ही यह तय करेगी कि आगरा भाजपा का सियासी ऊंट आखिर किस करवट बैठता है।