रामलीला: पितृपक्ष में शहनाइयों की गूंज, 150 साल पुरानी है राममय आगरा की कहानी; 1885 में ऐसे रखी गई थी नींव
आगरा की 150 साल पुरानी रामलीला परंपरा 1885 से आज तक जनकपुरी महोत्सव के साथ कायम है।
आगरा। देश में इस समय पितृपक्ष का मौन है। लोग पितरों का तर्पण कर रहे हैं और मांगलिक कार्यों पर विराम लगा हुआ है। लेकिन ताजनगरी आगरा की गलियों में इन दिनों माता जानकी की मेहंदी के मंगलगीत और श्रीराम बरात की तैयारियों की गूंज सुनाई दे रही है। राम बरात और जनकपुरी के भव्य स्वागत की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। यही परंपरा आगरा की रामलीला और जनकपुरी को देश के अन्य आयोजनों से अलग पहचान देती है।
आगरा की रामलीला अब अपनी 150 साल पुरानी विरासत के ऐतिहासिक पड़ाव की ओर बढ़ रही है। वर्ष 1885 में रावतपाड़ा स्थित लाला चन्नोमल की बारादरी से शुरू हुई यह परंपरा आज शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। शुरुआती दौर में न भव्य मंच थे और न ही आधुनिक रोशनी की व्यवस्था। समाज के लोगों के सहयोग से रामलीला का आयोजन शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह पूरे शहर का प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव बन गया।
1885 में रखी गई थी रामलीला की नींव
रामलीला की शुरुआत में भगवानदास उर्फ भग्गामल डेरे वाले, लाला गिर्राज किशोर और पीपलमंडी के मुंशी शिवनारायण जैसे अग्रणियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन के लिए चंदा जुटाया गया और जरूरत पड़ने पर लोगों ने अपनी जेब से भी धन लगाया। इस तरह समाज के सामूहिक सहयोग से रामलीला की परंपरा आगे बढ़ती रही।
वर्ष 1891 में रामलीला को संस्थागत स्वरूप मिला और श्रीरामलीला कमेटी का गठन किया गया। इसके पहले मंत्री बांकेलाल बने। इसके बाद वर्ष 1908 में समाजसेवी लाला कोकामल ने कमेटी की कमान संभाली और लंबे समय तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
बैलगाड़ियों से शुरू हुआ सफर, अब भव्य कारवां
समय के साथ आगरा की राम बरात का स्वरूप भी लगातार बदलता गया। कभी बैलगाड़ियों पर निकलने वाली राम बरात आज 110 से अधिक झांकियों, 15 से ज्यादा बैंड-बाजों और ऊंटों पर बजते नगाड़ों के साथ विशाल सांस्कृतिक कारवां का रूप ले चुकी है।
दशरथ वंश की गौरवशाली पताका भी राम बरात की पहचान का हिस्सा है। हाथियों के जुलूस पर रोक के बाद अब राजसी कृत्रिम हाथियों वाले विशेष रथों पर चारों भाइयों को विराजमान कराया जाता है। परंपरा और आधुनिक व्यवस्था के इस मेल ने राम बरात को और भव्य स्वरूप दिया है।
1940 में 10 हजार रुपये था पूरा बजट
आगरा की रामलीला के विकास की कहानी उसके बजट से भी समझी जा सकती है। कमेटी के प्राचीन अभिलेखों के अनुसार 1940 में रामलीला, राम बरात और जनकपुरी का कुल खर्च करीब 10 हजार रुपये था। इसमें आतिशबाजी पर 450 रुपये और अखाड़ों पर 350 रुपये खर्च किए गए थे।
वर्ष 1970 तक यह बजट बढ़कर करीब 80 हजार रुपये हो गया। उस समय कमेटी के पास 10 लकड़ी के रथ, चार लकड़ी के घोड़े और ऐरावत हाथी का डोला हुआ करता था।
इसी दौर में जनसहयोग की एक बड़ी मिसाल सामने आई। वर्ष 1970 में 40 दानदाताओं के सहयोग से करीब 75 हजार रुपये की लागत से चांदी का भव्य रथ तैयार कराया गया। यह ऐतिहासिक रथ आज भी राम बरात में भगवान श्री लक्ष्मी-नारायण के वाहन के रूप में शामिल होता है।
आज जनकपुरी के विकास के लिए नगर निगम ने करीब 12 करोड़ रुपये का बजट रखा है, जबकि आयोजन समिति की ओर से दो से तीन करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
जनकपुरी महोत्सव है रामलीला की खास पहचान
आगरा की रामलीला की सबसे अनूठी परंपराओं में जनकपुरी महोत्सव का नाम सबसे ऊपर आता है। तीन दिनों के लिए शहर का कोई एक इलाका मिथिलापुरी यानी जनकपुरी के रूप में सजाया जाता है। यहां माता जानकी और भगवान श्रीराम के विवाह प्रसंग को भव्य स्वरूप दिया जाता है।
जनकपुरी महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1954 में यमुना किनारे स्थित मथुरेश जी के मंदिर से हुई थी। अगले वर्ष 1955 में यह आयोजन सदर बाजार पहुंचा। इसके बाद जनकपुरी ने धीरे-धीरे आगरा के अलग-अलग इलाकों का सफर तय किया।
विभिन्न वर्षों में प्रतापपुरा, देहली गेट, शहजादी मंडी, लाजपत कुंज, जयपुर हाउस, पुरानी विजय नगर कॉलोनी, संजय प्लेस, छीपीटोला, न्यू आगरा, विभव नगर, लॉयर्स कॉलोनी, आवास विकास सिकंदरा और दयालबाग सहित कई क्षेत्रों में जनकपुरी सजाई गई।
वर्ष 2023 में एक बार फिर संजय प्लेस में जनकपुरी सजी, जबकि 2024 और 2025 में शाहगंज स्थित कोठी मीना बाजार में भव्य आयोजन हुआ।
2026 में भावना एस्टेट बनेगा मिथिलापुरी
अब वर्ष 2026 में भावना एस्टेट, सिकंदरा जनकपुरी महोत्सव की मेजबानी के लिए तैयार है। यहां तीन दिनों तक क्षेत्र को मिथिलापुरी के रूप में सजाया जाएगा। भगवान श्रीराम और माता जानकी के विवाह प्रसंग से जुड़े कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन होंगे।
पितृपक्ष के बीच जहां देशभर में मांगलिक गतिविधियां शांत हैं, वहीं आगरा में रामलीला की तैयारियां शहर की सांस्कृतिक धड़कन को जीवंत कर रही हैं। 1885 में रावतपाड़ा से शुरू हुई यह यात्रा आज डेढ़ सदी के पड़ाव तक पहुंच चुकी है।
बैलगाड़ियों से आधुनिक रथों तक, सीमित संसाधनों से करोड़ों के आयोजनों तक और एक छोटे स्थानीय आयोजन से पूरे शहर की सांस्कृतिक पहचान तक—आगरा की रामलीला ने करीब 150 वर्षों में एक लंबा सफर तय किया है। यही वजह है कि राम बरात और जनकपुरी आज भी ताजनगरी की धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सामूहिक जनभागीदारी की अनूठी मिसाल मानी जाती हैं।