खुले नाले बने मुसीबत: बदबू और जहरीली गैसों के बीच जीने को मजबूर लोग, सांस और त्वचा संबंधी बीमारियों का बढ़ा खतरा
आगरा के 18 बड़े खुले नालों के किनारे 5 लाख से ज्यादा लोगों के रहने का दावा है। गंदगी, दूषित पानी और दुर्गंध से सांस व त्वचा संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
आगरा में खुले नाले सिर्फ गंदगी और बदबू की समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि इनके किनारे रहने वाली बड़ी आबादी के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। शहर के करीब 18 बड़े नालों के आसपास पांच लाख से अधिक लोगों के रहने का दावा किया जा रहा है। लंबे समय तक गंदगी, दूषित पानी और दुर्गंध के संपर्क में रहने से लोगों में सांस और त्वचा संबंधी परेशानियां बढ़ रही हैं।
मंटोला, काजीपाड़ा, जगदीशपुरा, लोहामंडी, खतैना, राजनगर, बोदला, धनौली, ताजगंज और भैंरो नाला समेत कई इलाकों में खुले नाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। नाले उफनने के बाद गंदा और बदबूदार पानी घरों और गलियों तक पहुंच जाता है।
नालों की गंदगी से सांस और त्वचा की परेशानी
खुले नालों में जमा गंदगी और सड़ते जैविक पदार्थों से दुर्गंध पैदा होती है। स्थानीय स्तर पर इनसे अमोनिया, मीथेन और अन्य गैसों के संपर्क की चिंता जताई जा रही है। लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से सांस संबंधी परेशानी, आंखों में जलन और एलर्जी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
वहीं नालों की सिल्ट और दूषित पानी के संपर्क में आने से त्वचा पर संक्रमण का खतरा भी रहता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक फोड़े-फुंसी, खुजली, एलर्जी और अन्य त्वचा संबंधी शिकायतें आम हो रही हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में पहुंच रहे मरीज
एसएन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के अनुसार, नालों के आसपास रहने वाले लोगों में बैक्टीरियल और फंगल इंफेक्शन की शिकायतें देखने को मिल रही हैं। दावा है कि 300 से अधिक मरीज प्रतिदिन त्वचा संबंधी संक्रमण के इलाज के लिए ओपीडी पहुंच रहे हैं। निजी चिकित्सकों के पास पहुंचने वाले मरीजों की संख्या इससे कहीं अधिक होने की बात भी कही गई है।
डॉक्टरों के मुताबिक बच्चों को ऐसे वातावरण में संक्रमण का खतरा ज्यादा हो सकता है, क्योंकि वे अक्सर गंदे पानी और मिट्टी के संपर्क में आते हैं।
डॉक्टर बोले- लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण से बचना जरूरी
एसएन मेडिकल कॉलेज के वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. जीवी सिंह के अनुसार, खुले नालों के आसपास रहने वाले लोगों में डेंगू और मलेरिया के अलावा सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी रहता है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा और नालों से निकलने वाली दुर्गंध के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि नालों से रिसने वाला दूषित पानी भूजल को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में दूषित पानी के इस्तेमाल से टाइफाइड समेत जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
एसएन मेडिकल कॉलेज के डॉ. यतेंद्र चाहर के मुताबिक, नालों में जमा कीचड़ और गंदगी के संपर्क में आने से बैक्टीरियल और फंगल इंफेक्शन हो सकता है। फोड़े-फुंसी, दर्द, एलर्जी और खुजली जैसी समस्याएं अधिक देखने को मिल रही हैं। बच्चों को विशेष सावधानी की जरूरत है।
बारिश में घरों में भर जाता है काला और बदबूदार पानी
लंगड़े की चौकी क्षेत्र के पार्षद किशन नायक के मुताबिक बारिश के दौरान नाले उफनने से कई घरों में गंदा, काला और बदबूदार पानी भर जाता है। इसके संपर्क में आने के बाद लोगों के हाथ-पैरों में फोड़े-फुंसी और त्वचा संबंधी शिकायतें सामने आती हैं।
स्थानीय लोगों की मांग है कि नालों की मरम्मत के साथ उन्हें ढकने की व्यवस्था की जाए, ताकि दुर्गंध के साथ-साथ नालों में गिरने की घटनाओं को भी रोका जा सके।
तीन किलोमीटर लंबा है शाही कैनाल नाला
शाही कैनाल नाला करीब तीन किलोमीटर लंबा और 12 से 15 फीट तक गहरा बताया जाता है। यह न्यू आगरा से वाटरवर्क्स तक पहुंचता है। लंगड़े की चौकी क्षेत्र में इस नाले में बच्चों के गिरने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
नाले की सफाई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विरोध भी हो चुका है। सफाई की मांग को लेकर भाजपा पार्षद द्वारा नाले के पास केक काटकर विरोध जताने का मामला भी चर्चा में रहा था।
पुनियापाड़ा नाले के दोनों ओर बसे हैं घर
पुनियापाड़ा नाला करीब एक किलोमीटर लंबा और 8 से 10 फीट तक गहरा बताया गया है। इसके दोनों ओर बड़ी संख्या में घर और बस्तियां हैं। बस्तियों के बीच से गुजरने के कारण नाले की नियमित सफाई में भी परेशानी सामने आती है।
नाले में जमा कीचड़ और कचरे के कारण सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया पनपने की आशंका रहती है। यही वजह है कि आसपास रहने वाले लोगों में संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याओं को लेकर चिंता बनी हुई है।
सिर्फ सफाई नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत
खुले नालों की समस्या से निपटने के लिए केवल समय-समय पर सफाई कराना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। स्थानीय लोगों की मांग है कि नालों की नियमित सफाई के साथ उनकी सुरक्षा, मरम्मत, ढकने और जल निकासी की स्थायी व्यवस्था की जाए।
पांच लाख से अधिक लोगों की आबादी से जुड़े इस मुद्दे में स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों पहलू महत्वपूर्ण हैं। यदि खुले नालों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ तो बारिश के मौसम में जलभराव, संक्रमण और दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना रह सकता है।