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90 करोड़ की इमारत 10 साल में जर्जर: उखड़ी टाइल्स और गिरी फॉल्स सीलिंग ने खोली निर्माण की पोल

आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज की करीब 90 करोड़ रुपये की सर्जरी एंड एलाइड स्पेशलिस्ट ब्लॉक इमारत महज कुछ वर्षों में बदहाल हो गई। उखड़ी टाइल्स, टूटी फॉल्स सीलिंग, खराब AC और उखड़ते प्लास्टर ने निर्माण गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


  • August 23, 2026
  • 1 minute
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आगरा। सरकारी मेडिकल कॉलेज में करोड़ों रुपये की लागत से तैयार भवन अगर महज कुछ वर्षों में ही बदहाल हो जाए, तो सवाल सिर्फ मरम्मत का नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल का भी उठता है। आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के सर्जरी एंड एलाइड स्पेशलिस्ट ब्लॉक की मौजूदा स्थिति कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रही है।

करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस सात मंजिला भवन में जगह-जगह टाइल्स उखड़ रही हैं, प्लास्टर गिर रहा है और फॉल्स सीलिंग क्षतिग्रस्त हो चुकी है। कई हिस्सों में सीलिंग टूटने से मरीजों और तीमारदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। भवन में सेंट्रल एसी भी लंबे समय से खराब बताया जा रहा है, जिसके चलते कई जगह कूलर, पंखे और कामचलाऊ विंडो एसी का सहारा लिया जा रहा है।

10 साल में ही सामने आने लगीं खामियां

पोस्टमार्टम हाउस के पास इस भवन का निर्माण कार्य वर्ष 2008-09 में शुरू हुआ था। शुरुआती बजट करीब 85 करोड़ रुपये था। यह जी प्लस-7 भवन वर्ष 2016 में तैयार हुआ और उसी दौरान इसे एसएन मेडिकल कॉलेज को हैंडओवर किया गया।

निर्माण पूरा होने के बाद भवन में रैंप और ऑपरेशन थिएटर की कमी सामने आई। इसके लिए करीब पांच करोड़ रुपये अतिरिक्त स्वीकृत किए गए, जिसके बाद रैंप और ऑपरेशन थिएटर का निर्माण कराया गया।

लेकिन भवन के उपयोग में आने के कुछ वर्षों बाद ही इसकी टाइल्स उखड़ने और फॉल्स सीलिंग खराब होने की शिकायतें सामने आने लगीं। जगह-जगह प्लास्टर भी कमजोर होकर गिरने लगा। इससे भवन की निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे।

फॉल्स सीलिंग बनी खतरा

सर्जरी ब्लॉक की गैलरी और वार्ड में फॉल्स सीलिंग के कई हिस्से टूट चुके हैं। ऐसी स्थिति में मरीजों और उनके साथ मौजूद तीमारदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता स्वाभाविक है।

बताया गया कि फॉल्स सीलिंग के हिस्से गिरने की घटनाओं में कई बार मरीज बाल-बाल बचे। अब क्षतिग्रस्त हिस्सों को हटाकर नए सिरे से फॉल्स सीलिंग लगाने का काम शुरू किया गया है। गैलरी में सीलिंग का काम काफी हद तक पूरा हो चुका है, जबकि कुछ वार्डों में अभी भी स्थिति सुधार की मांग कर रही है।

चार विभाग और दो लैब, रोज हजारों लोगों की आवाजाही

यह भवन अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां सर्जरी, हड्डी रोग, वक्ष एवं क्षय रोग और ईएनटी विभाग संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा पैथोलॉजी और वायरोलॉजी लैब भी इसी भवन में चल रही हैं।

यहां रोजाना औसतन करीब 350 मरीज भर्ती रहते हैं, जबकि दो हजार से अधिक तीमारदार और जांच कराने वाले लोग आते-जाते हैं। चिकित्सकीय स्टाफ भी बड़ी संख्या में यहां कार्यरत है।

ऐसे में भवन की खराब स्थिति केवल सौंदर्य या सुविधा का विषय नहीं रह जाती, बल्कि किसी संभावित हादसे की आशंका को भी गंभीर बनाती है।

प्लास्टर उखड़ा, सीवेज सिस्टम भी परेशान कर रहा

भवन के कई हिस्सों में प्लास्टर उखड़ रहा है। इसके अलावा सीवेज सिस्टम के बार-बार खराब होने की समस्या भी सामने आती रही है। अस्पताल जैसे संस्थान में सीवेज व्यवस्था का खराब होना मरीजों और स्टाफ के लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा कर सकता है।

कभी आधुनिक सुविधाओं के उद्देश्य से तैयार किए गए इस भवन में अब कई जगह अस्थायी इंतजाम दिखाई देते हैं।

सेंट्रल AC खराब, कूलर और पंखों से चल रहा काम

भवन में लगाया गया सेंट्रल एयर कंडीशनिंग सिस्टम खराब होने के बाद कई हिस्सों में कूलर और पंखों से काम चलाया जा रहा है। कुछ वार्डों में विंडो एसी भी लगाए गए हैं।

मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान में, जहां मरीजों का लंबे समय तक इलाज और ऑपरेशन जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवाएं होती हैं, वहां ऐसी व्यवस्थाएं अस्पताल की सुविधाओं पर सवाल खड़े करती हैं।

आग की घटना के बाद भी उठे थे सवाल

भवन में आग लगने की घटना भी सामने आ चुकी है, जिसके बाद मरीजों को बाहर निकालना पड़ा था। उस समय आग से निपटने की व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठे थे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भवन में कथित घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए प्रदर्शन भी किए हैं। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता तय करने के लिए स्वतंत्र तकनीकी जांच और दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी है।

प्राचार्य बोले- मरम्मत का काम कराया जा रहा

एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता का कहना है कि भवन उनके कार्यकाल से पहले तैयार हुआ था। उन्होंने बताया कि भवन में मरम्मत का काम कराया जा रहा है और क्षतिग्रस्त फॉल्स सीलिंग को नए सिरे से लगाने का कार्य चल रहा है।

करोड़ों की इमारत पर अब सबसे बड़ा सवाल

करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से तैयार भवन का इतनी जल्दी जर्जर होना कई सवाल छोड़ता है। निर्माण के दौरान गुणवत्ता की निगरानी कैसी थी? इस्तेमाल की गई सामग्री की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई? भवन हैंडओवर होने के बाद रखरखाव की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही?

इन सवालों का जवाब केवल आरोपों से नहीं, बल्कि तकनीकी ऑडिट, निर्माण रिकॉर्ड, गुणवत्ता जांच और जिम्मेदारी तय करने वाली निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।

क्योंकि मामला सिर्फ एक इमारत की टाइल्स या फॉल्स सीलिंग का नहीं है। इस भवन में हर दिन सैकड़ों मरीज भर्ती होते हैं और हजारों लोग इलाज, जांच और चिकित्सा सेवाओं के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में मरीजों की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।


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