1940 में ₹10 हजार से शुरू हुई थी आगरा की ऐतिहासिक रामलीला, आज करोड़ों में पहुंचा बजट; रईसों ने जुटाया था चंदा
1885 में चंदे से शुरू हुई आगरा की ऐतिहासिक रामलीला का बजट 1940 में ₹10 हजार था, जो आज करोड़ों रुपये तक पहुंच गया है।
आगरा। आगरा की ऐतिहासिक श्रीरामलीला महोत्सव की परंपरा करीब 1885 से चली आ रही है। रावतपाड़ा के धनाढ्य लोगों द्वारा चंदा जुटाकर शुरू किया गया यह आयोजन आज भव्यता और 규모 के मामले में बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल है। कभी पूरे आयोजन पर हजारों रुपये खर्च होते थे, वहीं आज रामलीला, राम बरात और जनकपुरी समेत विभिन्न आयोजनों का बजट करोड़ों रुपये तक पहुंच चुका है।
रावतपाड़ा के लोगों ने मिलकर शुरू कराया था आयोजन
श्रीरामलीला महोत्सव के शुरुआती वर्षों में कोई औपचारिक कमेटी नहीं थी। भगवानदास (भग्गामल) डेरे वाले, लाला गिर्राज किशोर डेरे वाले और पीपलमंडी के मुंशी शिवनारायण समेत रावतपाड़ा के कई धनाढ्य लोग व्यक्तिगत स्तर पर संसाधन जुटाकर रामलीला का आयोजन कराते थे।
चंदे से रकम कम पड़ने पर सहयोगकर्ता अपनी जेब से खर्च उठाते थे। वर्ष 1891 में रामलीला कमेटी का गठन हुआ, जिसके बाद आयोजन को व्यवस्थित स्वरूप मिलने लगा।
1940 में पूरे आयोजन पर खर्च हुए थे ₹10 हजार
रामलीला कमेटी के अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 1940 में श्रीराम बरात, जनकपुरी और रामलीला मंचन समेत पूरे आयोजन पर करीब 10 हजार रुपये खर्च होते थे। उस दौर में आयोजन की भव्यता से ज्यादा लोगों की श्रद्धा और सामूहिक सहयोग इसकी सबसे बड़ी ताकत थी।
समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या, आयोजन का दायरा और व्यवस्थाएं बढ़ती गईं। इसका असर रामलीला के बजट पर भी पड़ा।
1970 के आसपास बजट हुआ करीब 80 हजार रुपये
कमेटी के गठन के बाद आयोजन के आय-व्यय का हिसाब रखने पर भी जोर दिया गया। वर्ष 1970 के आसपास पूरे वर्ष का बजट करीब 80 हजार रुपये था। उस समय आतिशबाजी पर लगभग 450 रुपये और अखाड़ों पर करीब 350 रुपये खर्च किए जाते थे।
इसी दौर में रामलीला के संसाधनों का भी विस्तार हुआ। 1970 के दशक तक कमेटी के पास करीब 10 लकड़ी के रथ, चार लकड़ी के घोड़े और ऐरावत हाथी का डोला मौजूद था।
चंदे से तैयार हुआ था रजत रथ
रामलीला महोत्सव में श्रीराम बरात और जनकपुरी का विशेष आकर्षण रहा है। वर्ष 1970 में भगवान विष्णु के स्वरूप के लिए रजत रथ तैयार कराया गया था। इसकी लागत करीब 75 हजार रुपये बताई जाती है और इसे तैयार कराने में करीब 40 दानदाताओं ने सहयोग किया था।
यह रजत रथ आज भी सुरक्षित है और परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु का स्वरूप इसी रथ पर सवार होकर राम बरात में शामिल होता है।
आज करोड़ों में पहुंचा रामलीला का बजट
समय के साथ रामलीला महोत्सव का स्वरूप लगातार भव्य होता गया। आज आयोजन में रामलीला मंचन, राम बरात, झांकियां, रथ, जनकपुरी, सजावट, प्रकाश व्यवस्था, कलाकारों और तकनीकी संसाधनों समेत कई मदों पर खर्च होता है।
1940 में करीब 10 हजार रुपये से शुरू हुआ यह आर्थिक सफर आज करोड़ों रुपये के बजट तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद आयोजन में सामूहिक सहयोग की परंपरा कायम है।
रावतपाड़ा से शुरू हुई यह परंपरा आज आगरा के विभिन्न हिस्सों तक विस्तार पा चुकी है। रामलीला महोत्सव की भव्यता के साथ इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी आज तक कायम है।