Taj Mahal: ताजमहल में क्यों लगाया गया काला पत्थर? जानिए मीनारों की निगरानी से जुड़ा 80 साल पुराना रहस्य
ताजमहल परिसर में लगा काला पत्थर कोई सजावटी हिस्सा नहीं, बल्कि मीनारों और मुख्य इमारत के झुकाव की निगरानी के लिए लगाया गया वैज्ञानिक बेंचमार्क है। 1941-42 की रिपोर्ट के बाद से ASI इसकी नियमित मॉनिटरिंग कर रहा है
आगरा: दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल की खूबसूरती जितनी आकर्षक है, उसकी संरचना की सुरक्षा उतनी ही वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। ताजमहल के परिसर में मेहमानखाना (गेस्ट हाउस) की ओर लगा एक काला पत्थर इन दिनों पर्यटकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। अधिकांश लोग इसे सजावट का हिस्सा समझते हैं, लेकिन वास्तव में यह पत्थर ताजमहल की चारों मीनारों और मुख्य इमारत की संरचनात्मक निगरानी के लिए लगाया गया एक बेंचमार्क (Reference Benchmark) है।
मीनारों के झुकाव पर रखी जाती है नजर
ताजमहल की चारों मीनारों और मुख्य इमारत में भूकंप, भूमि धंसने या अन्य प्राकृतिक कारणों से कहीं कोई झुकाव तो नहीं आ रहा, इसकी निगरानी इसी बेंचमार्क की मदद से की जाती है। विशेषज्ञ समय-समय पर आधुनिक सर्वेक्षण तकनीकों से इस पत्थर को आधार मानकर मीनारों और मुख्य भवन की स्थिति का सटीक आकलन करते हैं।
1941-42 की रिपोर्ट के बाद शुरू हुई निगरानी
ताजमहल की मीनारों की नियमित निगरानी का सिलसिला आजादी से पहले शुरू हुआ था। वर्ष 1941-42 में ब्रिटिश शासन के दौरान ताजमहल की चारों मीनारों में संभावित झुकाव की रिपोर्ट सामने आई थी। इसके बाद स्मारक की संरचनात्मक मजबूती का विस्तृत अध्ययन कराया गया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने बाद में सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) से हर पांच वर्ष में ताजमहल की संरचनात्मक स्थिति की रिपोर्ट लेना शुरू किया। इसी संस्थान ने ताजमहल के बगीचे में यह काला बेंचमार्क पत्थर स्थापित किया, जो आज भी निगरानी का महत्वपूर्ण आधार है।
आधुनिक तकनीक से होती है जांच
ताजमहल की मजबूती का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों ने कई आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। अध्ययन में इलेक्ट्रिकल प्रोफाइलिंग, मैग्नेटिक प्रोफाइलिंग, शीयर वेव स्टडी, ग्रेविटी सर्वे और ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) जैसी उन्नत तकनीकों की मदद ली गई।
इस अध्ययन में सामने आया कि ताजमहल के चमेली फर्श की ओर स्थित उत्तरी दीवार जमीन के स्तर से लगभग 12 से 13 मीटर गहरी है। वहीं मुख्य गुंबद के नीचे स्थित असली कब्रों के नीचे का हिस्सा पूरी तरह ठोस संरचना पर आधारित है, जिससे इमारत की मजबूती सुनिश्चित होती है।
ब्रिटिश काल में उठे थे मजबूती पर सवाल
ब्रिटिश शासन के दौरान ताजमहल के मुख्य गुंबद में दिखाई दी एक दरार के बाद इसकी मजबूती को लेकर सवाल उठे थे। इसके बाद सरकार ने "एडवाइजरी कमेटी ऑन द रेस्टोरेशन एंड कंजर्वेशन ऑफ ताजमहल" का गठन किया।
समिति ने मुख्य मकबरे पर मौजूद लगभग 12 हजार टन वजनी गुंबद के दबाव और पूरी संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन किया। वर्ष 1942 में प्रस्तुत रिपोर्ट में ताजमहल को पूरी तरह सुरक्षित बताया गया। हालांकि रिपोर्ट में मीनारों के हल्के झुकाव का भी उल्लेख किया गया, जिसके बाद उनकी नियमित निगरानी की व्यवस्था शुरू की गई।
आज भी जारी है वैज्ञानिक निगरानी
आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) समय-समय पर ताजमहल की संरचना का निरीक्षण करता है। बेंचमार्क पत्थर और आधुनिक सर्वेक्षण उपकरणों की मदद से यह सुनिश्चित किया जाता है कि विश्व धरोहर ताजमहल की मीनारों और मुख्य इमारत में किसी भी प्रकार का असामान्य झुकाव या संरचनात्मक बदलाव समय रहते पता चल सके।
ताजमहल केवल प्रेम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना भी है। यही वजह है कि इसकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए वैज्ञानिक स्तर पर लगातार निगरानी की जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी भव्यता को उसी रूप में देख सकें।